1
_वही ज़मीन है वही आसमान वही हम तुम,
सवाल यह है ज़माना बदल गया कैसे।
ज़िंदा रहने की अब ये तरकीब निकाली है,
ज़िंदा होने की खबर सबसे छुपा ली है।
खूब हौसला बढ़ाया आँधियों ने धूल का,
मगर दो बूँद बारिश ने औकात बता दी।
तारीफ़ अपने आप की करना फ़िज़ूल है,
खुशबू खुद बता देती है कौन सा फूल है।
पाँवों के लड़खड़ाने पे तो सबकी है नजर,
सर पे कितना बोझ है कोई देखता नहीं।
💕💕💕💕💕
2
_रात की गहराई आँखों में उतर आई,
कुछ ख्वाब थे और कुछ मेरी तन्हाई,
ये जो पलकों से बह रहे हैं हल्के हल्के,
कुछ तो मजबूरी थी कुछ तेरी बेवफाई।
💕💕💕💕💕
3
यूँ तो हादसों में गुजरी है हमारी ज़िन्दगी,
हादसा ये भी कम नहीं कि हमें मौत न मिली।
ले रहा है तू खुदाया इम्तेहाँ दर इम्तेहाँ,
पर स्याही ज़िन्दगी की खत्म क्यूँ होती नहीं।
तसव्वुर में न जाने कातिबे-तकदीर क्या था,
मेरा अंजाम लिखा है मेरे आगाज से पहले।
💕💕💕💕💕
4
– कोइ इस दर्द-ए-दिल की दवा ला दो मुझे,
किसी पे ऐतबार न करूँ वो हुनर सिखा दो मुझे,
वैसे मैं हर एक खेल का शौक रखता हूँ,
दिलों से खेलना भी कोई सिखा दो मुझे।
💕💕💕💕💕
5
इसे इत्तेफाक समझो
या दर्द भरी हकीकत,
आँख जब भी नम हुई,
वजह कोई अपना ही था।
वक़्त बहुत कुछ, छीन लेता है…
खैर मेरी तो सिर्फ़ मुस्कुराहट थी।
💕💕💕💕💕💕
6
– बहुत लहरों को पकड़ा डूबने वाले के हाथों ने,
यही बस एक दरिया का नजारा याद रहता है,
मैं किस तेजी से जिन्दा हूँ मैं ये तो भूल जाता हूँ,
नहीं आना है दुनिया में दोबारा याद रहता है।
– 💕💕💕💕💕
7
दोस्ती नाम है सुख-दुख की कहानी का,
दोस्ती नाम है सदा मुस्कुराने का,
ये कोई पल भर की जान-पहचान नहीं
8
मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते,
है कोई ख्वाब की ताबीर बताने वाला?
कभी तो अपने अन्दर भी कमियां ढूढ़े,
ज़माना मेरे गिरेबान में झाँकता क्यूँ हैं।
करते हैं मेरी खामियों को बयान ऐसे,
लोग अपने किरदार में फ़रिश्ते हों जैसे।
,💕💕💕💕💕
9
– किस जगह रख दूँ तेरी याद के चिराग को,
कि रोशन भी रहूँ और हथेली भी ना जले।
बुझा भी दो सिसकते हुए यादों के चिराग,
इनसे कब हिज्र की रातों में उजाला होगा।
लफ्ज़, अल्फाज़, कागज़ और किताब,
कहाँ-कहाँ नहीं रखता तेरी यादों का हिसाब।
नींद को आज भी शिकवा है मेरी आँखों से,
मैंने आने न दिया उसको तेरी याद से पहले।
हर तरफ जीस्त की राहों में कड़ी धूप है,
बस तेरी याद के साए हैं पनाहों की तरह।
💕💕💕💕💕
10
– नींद आती है तो एक ख्वाब आता है,
ख्वाब में इक लड़की आती है,
और पीछे उसका बाप आता है,
फिर क्या…
फिर न नींद आती है न ख्वाब आता है।
अब क्यूँ तकलीफ होती है तुम्हें इस बेरुखी से,
तुम्हीं ने तो सिखाया है कि दिल कैसे जलाते हैं।
तुमने कहा था आँखें भर के देखा करो मुझे,
अब आँख तो भर आती है पर तुम नहीं दिखते।
बहुत मसरूफ हो शायद जो हम को भूल बैठे हो,
न ये पूछा कहाँ पे हो न यह जाना कि कैसे हो।
आखिर को ज़िन्दगी ने भी आज पूछ लिया मुझ से,
कहाँ
–